हिन्दी कविता मंच : जागी हुई आँखों में, बिखरा हुआ सा एक सपना है, वो सच था? या इक भ्रम में हम हैं!

 

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जागी हुई आँखों में, बिखरा हुआ सा एक सपना है,

वो सच था? या इक भ्रम में हम हैं!

 

क्या वो, महज इक मिथ्या था?

सत्य नहीं, तो वो क्या था?

पूर्णाभास, इक एहसास देकर वो गुजरा था,

बोए थे उसने, गहरे जीवन का आभास,

कल्पित सी, उस गहराई में,

कंपित है जीवन मेरा,

ये सच है या इक भ्रम में हम हैं!

 

जागी हुई आँखों में, बिखरा हुआ सा एक सपना है,

वो सच था? या इक भ्रम में हम हैं!

 

सोता हूँ,  उठता हूँ, बस चल पड़ता हूँ!

चुनता हूँ, उन सपनों को!

बुनता हूँ, टूटे-बिखरे से कंपित हर क्षण को,

भ्रम के बादल में, बुन लेता हूँ आकाश,

शायद, विस्मित इस क्षण में,

अंकित है, जीवन मेरा,

ये सच है या इक भ्रम में हम हैं!

 

जागी हुई आँखों में, बिखरा हुआ सा एक सपना है,

वो सच था? या इक भ्रम में हम हैं!

 

हिन्दी कविता मंच :  चुन लूँ, कौन सा पल, कौन सी यादें!

 

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बुनती गई मेरा ही मन, उलझा गई मुझको,

कोई छवि, करती गई विस्मित,

चुप-चुप अपलक गुजारे, पल असीमित,

गूढ़ कितनी, है उसकी बातें!

 

चुन लूँ, कौन सा पल, कौन सी यादें!

 

बहाकर ले चला, समय का विस्तार मुझको,

यूँ ही बह चला, पल अपरिमित,

बिखेरकर यादें कई, हुआ वो अपरिचित,

कल, पल ना वो बिसरा दे!

 

चुन लूँ, कौन सा पल, कौन सी यादें!

 

ऐ समय, चल तू संग-संग, थाम कर मुझको,

तू कर दे यादें, इस मन पे अंकित,

दिखा फिर वो छवि, तू कर दे अचंभित,

यूँ ना बदल, तू अपने इरादे!

 

चुन लूँ, कौन सा पल, कौन सी यादें!

 

हिन्दी कविता मंच : मन के शुकून सारे, ले चला था इंतजार....

 

दुविधाओं से भरे, वो शूल से पल,

निरंतर आकाश तकते, दो नैन निश्छल,

संभाले हृदय में, इक लहर प्रतिपल,

वही, इंतजार के दो पल,

करते रहे छल! 

क्षीण से हो चले, सारे आसार...

 

मन के शुकून सारे, ले चला था इंतजार....

 

थमी सी राह थी, रुकी सी प्रवाह,

उद्वेलित करती रही, अजनबी सी चाह,

भँवर बन बहते चले, नैनों के प्रवाह,

होने लगी, मूक सी चाह,

दे कौन संबल!

बिखरा, तिनकों सा वो संसार...

 

मन के शुकून सारे, ले चला था इंतजार....

 

टूटा था मन, खुद से रूठा ये मन,

कैसी कल्पना, कैसा अदृश्य सा बंधन!

जागी प्यास कैसी, अशेष है सावन,

तू हुआ, क्यूँ भाव-प्रवण!

धीर, अपना धर!

स्वप्न, कब बन सका अभिसार...

 

मन के शुकून सारे, ले चला था इंतजार....

 

हिन्दी कविता मंच : तनिक सहज, होने लगा हूँ

 

तनिक सहज, होने लगा हूँ मै अभी,

पर बादलों सा, उतर आओगे,

असहज, इस मन को कर जाओगे!

 

संचित हो आज भी, असंख्य लम्हों में तुम,

पर हूँ आज वंचित, सानिध्य से मैं!

बारिशों में, जब जलज सा उभर आओगे!

असहज, इस मन को कर जाओगे!

 

तुम्हें इख्तियार था, जाओ या ठहर जाओ,

इख्तियार से अपने, वंचित रहा मैं,

एकल अधिकार, हर बार तुम दिखाओगे!

असहज, इस मन को कर जाओगे!

 

सारे पल इन्तजार के, हो अब चले है सूने,

सहज एहसास, चुनने लगा हूँ मैं,

कोई राग बन कर, सीने में उतर आओगे!

असहज, इस मन को कर जाओगे!

 

तनिक सहज, होने लगा हूँ मै अभी,

धुँध बन कर, बिखर जाओगे,

असहज, इस मन को कर जाओगे!

 

हिन्दी कविता मंच : वो चाँद चला, छलता, अपने ही पथ पर!

बोल भला, तू क्यूँ रुकता है?
ठहरा सा, क्या तकता है?
कोई जादूगरनी सी, है वो  स्निग्ध चाँदनी,
अन्तः तक छू जाएगी,
यूँ छल जाएगी!

वो चाँद चला, छलता, अपने ही पथ पर!

कुछ कहता, वो भुन-भुन-भुन!
कर देता हूँ मैं, अन-सुन!
यथासंभव, टोकती है उसकी ज्योत्सना,
यथा-पूर्व जब रात ढ़ला,
यूँ कौन छला?

वो चाँद चला, छलता, अपने ही पथ पर!

दुग्ध सा काया, फिर भरमाया,
चकोर के, मन को भाया
पाकर स्निग्ध छटा, गगण है शरमाया,
महमाई फिर निशिगंधा,
छल है छाया!

वो चाँद चला, छलता, अपने ही पथ पर!